शिवनगर तालुका में जहां दिसंबर तक कुएं अक्सर सूख जाते हैं, वहां अब काली प्लास्टिक से बने चौकोर तालाब जगह-जगह दिखते हैं। किसानों का कहना है कि इन छोटे जलाशयों की वजह से वे दस साल में पहली बार दूसरी फ़सल ले पा रहे हैं।
पिछले तीन साल में सरकारी सब्सिडी, बैंक क़र्ज़ और किसानों के अपने पैसे से 900 से ज़्यादा खेत तालाब खोदे गए हैं। हर तालाब मानसून में बारिश का पानी जमा करता है और सूखे महीनों में सिंचाई के काम आता है।
देवळी खुर्द गांव के पास चार एकड़ में खेती करने वाले ज्ञानेश्वर पाटिल ने कहा, "पहले हम एक फ़सल बोते थे और दुआ करते थे। अब बारिश के बाद प्याज़ और चारा उगाता हूं, और गर्मियों में मवेशी बेचने नहीं पड़ते।"
क्या बदला
- तालाब वाले किसानों ने पिछले साल अपनी लगभग 60 प्रतिशत ज़मीन पर रबी फ़सल ली।
- पीने के पानी के टैंकरों की मांग तीन साल पहले के मुक़ाबले आधी रह गई।
- कई किसानों ने ड्रिप सिंचाई अपनाई, ताकि जमा पानी ज़्यादा दिन चले।
कृषि अधिकारियों का कहना है कि तालाब तभी अच्छे से काम करते हैं जब सोच-समझकर फ़सल चुनी जाए और भूजल के इस्तेमाल पर गांव के नियम हों। एक तालुका कृषि अधिकारी ने कहा, "तालाब पानी का बैंक खाता है। अगर सब बिना योजना के एक साथ निकालेंगे, तो वह ख़ाली हो जाएगा।"
तालुका की योजना है कि हर तालाब को एक सार्वजनिक डैशबोर्ड पर दिखाया जाए और गांव की समितियों को सर्दियों की शुरुआत में हर तालाब का पानी मापने की ट्रेनिंग दी जाए।








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