देवळी खुर्द गांव के बाहर एक टिन शेड में मशीनों की आवाज़ सुबह से शाम तक आती रहती है। यह गांव की 12 महिला स्वयं सहायता समूहों की मिलकर चलाई जा रही दाल मिल है, जिसने पिछले छह महीनों में आसपास के किसानों के लिए कमाई का नया रास्ता खोला है।
पहले किसान अपनी तुअर व्यापारियों को सीधे बेच देते थे। अब वे चाहें तो मिल में दाल बनवा सकते हैं, पैक करा सकते हैं और समूह के ज़रिए शहर के दुकानदारों को बेच सकते हैं। मिल प्रति किलो एक तय शुल्क लेती है।
समूहों की संघ की अध्यक्ष सुमन जाधव ने कहा, "हमने हिसाब लगाया कि दाल बनाने में जो मुनाफ़ा है, वह गांव से बाहर चला जाता है। अब उसका कुछ हिस्सा गांव की महिलाओं और किसानों के पास रहता है।"
कैसे चलती है मिल
- 40 महिलाएं बारी-बारी से मिल में काम करती हैं और उन्हें रोज़ की मज़दूरी मिलती है।
- हर बैच का वज़न और गुणवत्ता एक रजिस्टर में दर्ज होती है।
- पैकेट पर गांव और समूह का नाम छपता है।
- मुनाफ़े का एक हिस्सा मशीनों की मरम्मत के लिए अलग रखा जाता है।
मिल के लिए पैसा बैंक क़र्ज़ और समूहों की बचत से आया। पहला क़र्ज़ समय से पहले चुकाया जा चुका है। समूह अब चना और मूंग की दाल के लिए भी मशीनें जोड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
गांव के किसान रामदास शिंदे ने कहा, "पहले व्यापारी जो भाव बोलता था, वही मानना पड़ता था। अब कम से कम हमारे पास दूसरा रास्ता है।"









टिप्पणियाँ
टिप्पणियाँ