भैरोंपुर की एक गली में घुसते ही चमड़े और मोम की गंध आती है। यहां 60 से ज़्यादा परिवार पीढ़ियों से लेदर क्रिकेट बॉल की सिलाई का काम करते हैं। गेंद का भीतरी हिस्सा कारख़ाने से आता है, लेकिन चमड़े के खोल को हाथ से सिलने का काम इन्हीं घरों में होता है।
55 साल के कारीगर इक़बाल अहमद रोज़ सुबह सात बजे काम शुरू करते हैं। "एक अच्छी गेंद की सिलाई में सबसे ज़्यादा ध्यान सीम पर देना पड़ता है। सीम सीधी न हो तो गेंद हवा में ठीक नहीं चलती।" एक कारीगर दिन भर में चार-पांच गेंदें सिल पाता है।
कारीगरों की चुनौतियां
- प्रति गेंद मज़दूरी कई सालों से लगभग वही है, जबकि महंगाई बढ़ी है।
- मशीन से बनी सस्ती गेंदों से बाज़ार में कड़ा मुक़ाबला।
- लगातार झुककर काम करने से आंखों और पीठ की तकलीफ़।
- युवा पीढ़ी इस काम में आने से हिचकती है।
कुछ युवा कारीगरों ने अब सीधे क्लबों और अकादमियों को गेंदें बेचना शुरू किया है। 26 साल के फ़ैज़ान ने बताया कि वे सोशल मीडिया पर सिलाई के वीडियो डालते हैं, जिससे ऑर्डर मिलने लगे हैं।
कारीगरों के एक समूह ने ज़िला उद्योग केंद्र से साझा वर्कशॉप, बेहतर रोशनी और आंखों की नियमित जांच की मांग की है। उद्योग केंद्र ने कहा है कि हस्तशिल्प योजना के तहत प्रस्ताव पर विचार किया जाएगा।









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