62 साल की रामप्यारी देवी ने ज़िंदगी भर खेत में काम करते हुए गाया है। रोपाई के गीत, कटाई के गीत, शादी के गीत और बच्चों को सुलाने वाली लोरियां। उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि ये गीत किसी मंच तक पहुंचेंगे।
दो साल पहले उनकी पोती ने खेत में गाते हुए उनका एक वीडियो सोशल मीडिया पर डाला। वीडियो को लाखों लोगों ने देखा, और जल्द ही लोक उत्सवों से बुलावे आने लगे।
रामप्यारी देवी ने कहा, "पहली बार मंच पर गई तो हाथ कांप रहे थे। फिर सोचा, ये भी खेत ही है, बस लोग ज़्यादा हैं। आंखें बंद कीं और गाने लगी।"
गीतों को बचाने की कोशिश
रामप्यारी देवी अब गांव के बच्चों को हर रविवार पुराने गीत सिखाती हैं। उनकी पोती इन गीतों को रिकॉर्ड करके उनके बोल लिख रही है, ताकि वे खो न जाएं।
- अब तक 80 से ज़्यादा गीत रिकॉर्ड किए जा चुके हैं।
- हर गीत के साथ यह भी लिखा जाता है कि वह किस मौक़े पर गाया जाता है।
- कई गीत ऐसे हैं जो गांव के बुज़ुर्गों के अलावा किसी को याद नहीं।
लोक संगीत पर काम करने वाले शोधकर्ता डॉ. विनय मिश्र कहते हैं कि ऐसे गीत खेती, मौसम और समाज का इतिहास अपने भीतर रखते हैं। "जब एक बुज़ुर्ग गायिका चली जाती है, तो एक पूरा पुस्तकालय चला जाता है।"
रामप्यारी देवी का सपना है कि उनके गीतों की एक किताब छपे। "मेरे बाद भी कोई खेत में ये गीत गाए, बस इतना चाहिए।"






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