माटी गली में मुश्किल से एक साइकिल रिक्शा निकल पाता है, लेकिन साल के छह हफ़्ते यह चंदनपुर की सबसे व्यस्त गली होती है। तिरपाल के नीचे कुम्हार परिवार पुआल के ढांचे बनाते हैं, उन पर नदी की मिट्टी चढ़ाते हैं और हर परत के सूखने के लिए मौसम का इंतज़ार करते हैं।
इस साल गली की 23 कार्यशालाएं सामुदायिक पंडालों और घरों के लिए 400 से ज़्यादा मूर्तियां बना रही हैं। गली के सबसे बुज़ुर्ग मूर्तिकार, 68 साल के गोपाल पाल ने बताया कि इनमें से क़रीब तीन-चौथाई में सिर्फ़ मिट्टी, पुआल, जूट और हल्दी, नील, फूलों व मिट्टी से बने रंग इस्तेमाल हो रहे हैं।
दो मीटर ऊंची मूर्ति का चेहरा गीले कपड़े से चिकना करते हुए उन्होंने कहा, "मेरे दादा ने कभी प्लास्टर या केमिकल वाले रंग इस्तेमाल नहीं किए। बीच में हम यह भूल गए। अब बच्चे ग्राहकों को फिर से मिट्टी की मूर्ति मांगना सिखा रहे हैं।"
ग्राहक क्यों बदल रहे हैं
- नदियां और तालाब। बिना पकी मिट्टी की मूर्तियां कुछ घंटों में घुल जाती हैं और पानी में न सख़्त परत छोड़ती हैं, न ज़हरीले रंग।
- मोहल्ले के नियम। कई हाउसिंग सोसाइटियां और पंडाल समितियां अब प्राकृतिक सामग्री की शर्त रखती हैं।
- कारीगरी। युवा ख़रीदारों को इसकी मुलायम, बिना चमक वाली फ़िनिश और ब्रश के निशान पसंद आते हैं।
प्राकृतिक रास्ते की क़ीमत
प्राकृतिक रंग तेज़ धूप में जल्दी फीके पड़ते हैं और इन्हें दो-तीन बार लगाना पड़ता है। मिट्टी की मूर्ति को सूखने में भी क़रीब एक हफ़्ता ज़्यादा लगता है, यानी ढकी हुई जगह ज़्यादा चाहिए और बारिश हो तो जोखिम भी ज़्यादा।
अपने दो बेटों के साथ कार्यशाला चलाने वाली रूपा पाल ने कहा, "प्राकृतिक मूर्ति बनाने में हमें क़रीब 20% ज़्यादा ख़र्च आता है। ज़्यादातर समितियां यह समझती हैं। कुछ अब भी मोलभाव करती हैं, लेकिन हर साल ऐसे लोग कम हो रहे हैं।"
गली के कारीगरों के अनौपचारिक समूह के मुताबिक़ प्राकृतिक मूर्तियों के ऑर्डर दो साल में दोगुने हो गए हैं। यह समूह अब सप्ताहांत में कार्यशालाएं भी चलाता है, जहां स्कूली बच्चे मिट्टी की छोटी मूर्तियां बनाकर घर ले जाते हैं।








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