ज़िला शिक्षा कार्यालय के आकलन के अनुसार 40 सरकारी स्कूलों में साल भर चली शाम की मुफ़्त गणित कक्षाओं से अमरौली ज़िले में 10वीं के गणित का पास प्रतिशत 61% से बढ़कर 78% हो गया है।
कक्षाएं हफ़्ते में पांच दिन, शाम 4.30 से 6 बजे तक उन स्कूल भवनों में चलीं जो आम तौर पर दोपहर बाद बंद हो जाते हैं। इन्हें अतिरिक्त भत्ते पर नियमित शिक्षकों और 60 प्रशिक्षित स्वयंसेवकों ने पढ़ाया, जिनमें से ज़्यादातर उन्हीं गांवों के नए स्नातक हैं।
ज़िला शिक्षा अधिकारी शालिनी वर्मा ने कहा, "कई बच्चों के घर में ऐसा कोई नहीं होता जो गणित के होमवर्क में मदद कर सके। शाम की कक्षा ने उन्हें एक शांत कमरा, एक शिक्षक और रोज़ दो घंटे का अभ्यास दिया।"
पायलट में क्या सामने आया
- हाज़िरी सबसे अहम रही। हफ़्ते में कम से कम तीन शाम आने वाले छात्रों के गणित में 60% से ज़्यादा अंक लाने की संभावना कभी-कभार आने वालों से लगभग दोगुनी रही।
- लड़कियों को ज़्यादा फ़ायदा। लड़कियों का पास प्रतिशत 21 अंक बढ़ा, जबकि लड़कों का 13 अंक। इसकी एक वजह यह भी रही कि स्कूलों ने घर साथ लौटने के लिए समूह बनाए।
- छोटे समूह कारगर। 15 या उससे कम छात्रों वाले समूहों ने बड़े समूहों से बेहतर प्रदर्शन किया।
आगे क्या
ज़िला अगले सत्र में विज्ञान की कक्षाएं जोड़ने और बजट मिलने पर दो साल में हर ब्लॉक तक योजना ले जाने की तैयारी में है। साथ ही काग़ज़ पर एक आसान साप्ताहिक क्विज़ भी आज़माया जा रहा है, ताकि शिक्षक पीछे छूट रहे छात्रों को समय पर पहचान सकें।
अभिभावकों का कहना है कि सबसे बड़ा बदलाव आत्मविश्वास में आया। 72% अंकों के साथ पास हुई छात्रा की मां सुनीता यादव ने कहा, "मेरी बेटी गणित की परीक्षा से पहले रोने लगती थी। इस साल वह अपने चचेरे भाई-बहनों को सवाल समझा रही थी।"
शिक्षा शोधकर्ताओं ने कहा कि एक साल के नतीजे सिर्फ़ शुरुआत हैं और ज़िले को देखना चाहिए कि यह सुधार 11वीं और 12वीं तक बना रहता है या नहीं।














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