पिछले साल जब भैरोंपुर का पंचायत दफ़्तर नई इमारत में गया, तो तालाब किनारे वाला पुराना कमरा बंद होकर भुला दिया गया। आज उसी कमरे में 1,400 किताबें, चार चटाइयां और हाथ से रंगा एक बोर्ड है, जिस पर लिखा है "पढ़ो, बढ़ो"।
यह कमरा उन 40 "पढ़ने के कोनों" में से एक है, जिन्हें सेवानिवृत्त शिक्षकों और कॉलेज छात्रों के एक स्वयंसेवी समूह ने तीन ब्लॉकों में शुरू किया है। हर कोना रोज़ शाम दो घंटे और रविवार सुबह खुलता है।
समूह की शुरुआत करने वाली सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापिका कमला देवी प्रसाद ने कहा, "हमें बड़ी इमारत नहीं चाहिए। हमें एक चाबी, एक अलमारी और रोज़ आने वाला एक व्यक्ति चाहिए।"
कैसे चलता है यह काम
- पंचायतें मुफ़्त में कमरा देती हैं और एक बल्ब व पंखे का बिल भरती हैं।
- किताबें दान से आती हैं, और बच्चों की एक समिति हर महीने एक नई किताब चुनती है।
- कॉलेज के छात्र सामुदायिक सेवा के तहत शाम का घंटा संभालते हैं।
- बड़े लोग अख़बार और खेती की पत्रिकाएं ले जा सकते हैं, बच्चे एक हफ़्ते के लिए कहानी की किताबें।
यहां आने वालों की संख्या लगातार बढ़ी है। स्वयंसेवक एक सादा रजिस्टर रखते हैं, जिसके मुताबिक़ ज़्यादातर शामों को हर कोने में 25 से 40 लोग आते हैं। इनमें बड़ी संख्या मिडिल स्कूल की लड़कियों की है।
समूह अब बुज़ुर्गों के लिए बड़े अक्षरों वाली किताबें और स्थानीय बोली में हर हफ़्ते कहानी सुनाने का सत्र जोड़ना चाहता है। प्रसाद ने कहा, "सबसे अच्छा पल वह होता है जब कोई बच्ची अपनी दादी को ज़ोर से पढ़कर सुनाती है।"
















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