आज ज़्यादातर होम लोन फ़्लोटिंग दर पर होते हैं, यानी लोन के दौरान ब्याज दर बदल सकती है। ऐसा होने पर बैंक या तो आपकी ईएमआई बदलता है या आपके भुगतान के महीनों की संख्या।
एक उदाहरण
मान लीजिए ₹30 लाख का लोन 20 साल (240 महीने) के लिए है। तीन ब्याज दरों पर हर महीने की ईएमआई इस तरह होगी:
| ब्याज दर | मासिक ईएमआई | 20 साल में कुल ब्याज |
|---|---|---|
| 8.50% | ₹26,035 | करीब ₹32.5 लाख |
| 8.75% | ₹26,511 | करीब ₹33.6 लाख |
| 9.00% | ₹26,992 | करीब ₹34.8 लाख |
आधे अंक की बढ़ोतरी से ईएमआई करीब ₹957 बढ़ती है और कुल ब्याज लगभग ₹2.3 लाख बढ़ जाता है।
ईएमआई बढ़े या अवधि?
अगर दर 9% होने के बाद भी बैंक आपकी ईएमआई ₹26,035 ही रखे, तो लोन 240 के बजाय करीब 267 महीने चलेगा, यानी दो साल से ज़्यादा अतिरिक्त।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या बेहतर है, ज़्यादा ईएमआई या लंबी अवधि?
अगर आपकी जेब इजाज़त दे, तो ज़्यादा ईएमआई में आम तौर पर कुल ब्याज कम लगता है। लंबी अवधि में मासिक बजट वही रहता है, लेकिन ब्याज बढ़ता है।
क्या मैं ख़ुद चुन सकता हूं?
कई बैंक कर्ज़दार के अनुरोध पर यह विकल्प देते हैं। बैंक से लिखित में पूछें और जवाब संभालकर रखें।
क्या बीच में कुछ रक़म जमा करने से फ़ायदा होता है?
हां। लोन की शुरुआत में छोटी-छोटी अतिरिक्त रक़म भी मूलधन और कुल ब्याज घटाती है। देख लें कि आपके लोन पर समय से पहले भुगतान का कोई शुल्क तो नहीं है।
ऊपर के आंकड़े ईएमआई के मानक फ़ॉर्मूले से निकाले गए हैं, इनमें फ़ीस और बीमा शामिल नहीं है। आपके अपने लोन के लिए बैंक का स्टेटमेंट ही अंतिम है।








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